सिद्धेश्वर जसनाथजी और उनके शिष्य हरोजी

बम्बलू के निवासी ऊदोजी के पुत्र हरोजी अपने रेवड़ को लेकर कतरियासर की ओर निकल जाते थे. वहां उन्होंने गोरखमालिये पर जसनाथजी को तपस्या में लीन तथा यज्ञादि अनुष्ठान संपन्न करते पाया. हरोजी जसनाथजी के व्यक्तित्व से बड़े प्रभावित हुए. अतः वे गोरखमालिये पर जाकर शान्ति पूर्वक बैठ जाते लेकिन मन में रेवड़ के भटक जाने की चिन्ता सदैव खटकती रहती. जसनाथजी ने हरोजी की दुश्चिंता को समझ उनसे कहा कि तुम मेरा नाम लेकर रेवड़ के चारों और 'कार' लगा दिया करो. 'कार' से बाहर रेवड़ का कोई पशु बाहर न जा सकेगा और उसके भीतर भी कोई पशु प्रवेश नहीं कर सकेगा. दुसरे दिन से हरोजी अपने रेवड़ को जसनाथजी के नाम की 'कार' लगा कर छोड़ देते और निश्चिन्त मन से जसनाथजी के आश्रम में बैठे सत्संग का आनंद लाभ करते. जब उनके पिता ऊदोजी को अपने पुत्र की गतिविधियों का ज्ञान हुआ तो वे पुत्र के, जसनाथजी की भांति, संन्यासी हो जाने की आशंका से भयभीत हुए और उन्होंने स्वयं रेवड़ चराने का काम संभाल हरोजी को घर का काम सौंप दिया. लेकिन वैराग्य और विरक्ति की भावना मन में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी. एक दिन हरोजी कुएं को जोतते हुए 'कीली' निकालने का कार्य कर रहे थे. इतने में ही वहां कतरियासर से कुछ व्यक्ति ऊंट पर आये. जसनाथजी के प्रति असीम श्रद्धा के कारण हरोजी कतरियासर और बम्बलू में चर्चा का विषय बन गये थे. अतः विनोद भावना से उन कतारियों ने हरोजी से कहा कि 'जाओ तुम्हें जसनाथजी गोरखमालिये पर बुला रहे हैं.' इतना सुनते ही हरोजी ने कीली निकाल फेंकी और उद्विग्न हो कतरियासर की और दौड़े तथा गोरखमालिये पर ही पहुंच कर सांस ली. ऊदोजी को जब यह ज्ञात हुआ तो वे भी गांव के अनेक व्यक्तियों के साथ गोरखमालिये पहुंचे. गोरखमालिये पर पहुंचते ही जसनाथजी की एक आवाज़ के साथ उनकी वृद्धावस्था के कारण झुकी हुई कमर सीधी हो गई. ऊदोजी जसनाथजी के उस चमत्कार से बड़े प्रभावित हुए तथा पुत्र सहित उनका शिष्यत्व स्वीकार किया. यही नहीं बम्बलू गांव के लगभग आधे परिवार 'सिद्ध' बन गये.
सिद्धों में यही कथा अवांतर के साथ प्रचलित है. एक बार हरोजी रेवड़ के चारों ओर कार लगाना भूल गये. स्वयं जसनाथजी के पास बैठे ज्ञान श्रवण करते रहे. काफी समय पश्चात जब उन्हें रेवड़ का ध्यान आया तो वे घबराकर उसे खोजने के लिये गए. पर रेवड़ का कहीं पता नहीं था. अन्त में हार कर बम्बलू गांव पहुंचे - तब तक रेवड़ उनके घर पहुंच चुका था. पिता ऊदोजी ने क्रोध में आकर उनके ऊपर धूल फेंकी और भला बुरा कहते हुए पीठ पर लाव की पोछ्ड़ी से मारा. हरोजी ग्लानियुक्त मन लिये पुनः जसनाथजी के पास गोरख मालिये पहुंच गये. यह देख कर पुत्र को लौटा लाने के लिये पिता भी वहां गये. लेकिन जसनाथजी के दर्शन मात्र से उनकी कमर सीधी हो गई. जसनाथजी से तब ऊदोजी ने क्षमा याचना की और पुत्र सहित उनका शिष्यत्व स्वीकार किया. इस पर जसनाथजी ने उन्हें अपना सिर व पीठ दिखाई. ऊदोजी आश्चर्यान्वित हो उठे - उन्होंने देखा कि धूल जो हरोजी के सिर में फेंकी गई थी वह जसनाथजी के सिर में पड़ी है तथा लाव की चोट का निशान भी जसनाथजी की पीठ पर लगा है. अपनी समाधि के समय जसनाथजी ने हरोजी को बम्बलू गांव के पूर्व में जाकर सिद्ध धर्म के प्रचार द्वारा जनता के नैतिक स्तर को ऊंचा उठाने के आदेश दिया था, तथा अपना अधिकारी शिष्य अपनी स्मृति स्वरूप सेवा सामग्री 'माला-मेखली' प्रदान की थी. जो कालान्तर में हरोजी को जसनाथजी के चचेरे भाई हंसोजी को सौंपनी थी.

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